“इज्जत का खेल ” -Motivational stories and inspirational stories in hindi

मैंने कई लोगो ऐसे लोगो को देखा है। जिन्हे दुसरो की बरा- बरी करने में संतुष्टि मिलती फिर चाहे वह क़र्ज़ लेकर ही क्यों न करना पड़े ,मुझे न जाने क्यों ऐसा लगता है कि हम लोगो कि मानसिकता ही कुछ ऐसी बन गई है कि अगर हम दिखावा नहीं करेंगे तो हमे कोई भी इज्जत या वो आदर नहीं देगा जिसके हम हक़दार है या जो हम पाना चाहते है। और शायद इसी आदर और इज्जत को पाने के लिए हम खेल खेलना शुरू कर देते है। जिसे कहते है “इज्जत का खेल ” इस खेल के कोई नियम नहीं होते क्योकि ये खेल हम इज्जत पाने के लिए खेलते है। इस खेल में बने रहने के लिए आदमी सब कुछ दाव पर लगाते चला जाता है और अंदर से खोंखला होता चला जाता है।अगर हमारे पडोसी ने कोई कार खरीदी तो हमारे बीवी बच्चे सभी उसको बताते है कि देखो शर्मा जी ने नई कार खरीदी है। हमारे घर वाले या कॉलोनी के लोगो से शर्मा जी को जो इज्जत मिलते देख , हम अपनी इज्जत भी बचाने का सोचते है और कार खरीदने की तैयारी करने लगते है। जबकि हम जानते है कि मोटर साइकल में पेट्रोल के लाले पड़े है पर कार खरीदना भी जरुरी है वर्ना इज्जत का खतरा , और हम पहुच जाते है कर्ज लेने किसी न किसी बैंक में , मुझे एक इंसान कि बात याद आती – एक बार मेरी गाड़ी ख़राब हो गई। उस वक़्त रात के तक़रीबन २ बज रहे थे। मैंने एक मिनी ट्रक वाले से लिफ्ट ली , उस मिनी ट्रक का ड्राइवर, देखने में ड्राइवर जैसा नहीं लग रहा था उसने अच्छे खासे कपडे पहने हुए थे , मैं उससे टाइम पास के लिए बाते करने लगा , लेकिन उसने मुझे इतने पते कि बात कही कि मैं उस बात को भूल नहीं पाया और शायद कभी भूल भी नहीं पाउँगा। जब मैं उससे बाते कर रहा था तो मैंने बातो बातो में उससे पूछा कि क्या ये मिनी ट्रक तुम्हारा है ,तुम इसके मालिक हो। चाहता तो वो हां या ना में जवाब दे सकता था परन्तु उसका जवाब कुछ ऐसा था -” नहीं सर मेरी नहीं है , और कौन मालिक। । मालिक तो बैंक वाले है और यदि यकीं न आये तो इंस्टालमेंट भरना बंद कर दो आपको पता चल जाएगा कि मालिक कौन है ” उसनेफिर अपनी कहानी बताई कि मेरे रिस्तेदार ने गाड़ी ली थी और उसकी सभी इज्जत करते थे तो मुझे लगा कि मैं भी मालिक बन जॉन तो मेरी भी इजात होगी परिवार में बस यही सोच कर मैंने मैं भी ले ली। लेकिन जब कुछ महीने इंस्टालमेंट नहीं भर पता हूँ तब पता चलता है कि मालिक बना हूँ या नौकर।
मैंने किसी किताब में एक कहानी पड़ी थी जिसके माध्यम से मैं आपको बता चाहता हूँ। भगवान ने जिस घर में पैदा किया है और जितना दिया है उसमे रहकर ही अपने कर्म करे और सिर्फ कर्म करे ताकि हम जो अफ़सोस कि जिंदगी गुजार रहे है वो हमारे बच्चे न गुजर पाए।

एक दिन कौए ने, जंगल में मोरों की बहुत सी पूंछें बिखरी पड़ी देखीं। वह अत्यंत प्रसन्न होकर कहने लगा- वाह भगवान! बड़ी कृपा की आपने, जो मेरी पुकार सुन ली। मैं अभी इन पूंछों से अच्छा खासा मोर बन जाता हूं। इसके बाद कौए ने मोरों की पूंछें अपनी पूंछ के आसपास लगा ली। फिर वह नया रूप देखकर बोला- अब तो मैं मोरों से भी सुंदर हो गया हूं। अब उन्हीं के पास चलकर उनके साथ आनंद मनाता हूं। वह बड़े अभिमान से मोरों के सामने पहुंचा। उसे देखते ही मोरों ने ठहाका लगाया। एक मोर ने कहा- जरा देखो इस दुष्ट कौए को। यह हमारी फेंकी हुई पूंछें लगाकर मोर बनने चला है। लगाओ बदमाश को चोंचों व पंजों से कस-कसकर ठोकरें। यह सुनते ही सभी मोर कौए पर टूट पड़े और मार-मारकर उसे अधमरा कर दिया। कौआ भागा-भागा अन्य कौए के पास जाकर मोरों की शिकायत करने लगा तो एक बुजुर्ग कौआ बोला- सुनते हो इस अधम की बातें! यह हमारा उपहास करता था और मोर बनने के लिए बावला रहता था। इसे इतना भी ज्ञान नहीं कि जो प्राणी अपनी जाति से संतुष्ट नहीं रहता, वह हर जगह अपमान पाता है। आज यह मोरों से पिटने के बाद हमसे मिलने आया है। लगाओ इस धोखेबाज को कसकर मार। इतना सुनते ही सभी कौओं ने मिलकर उसकी अच्छी मरम्मत की।

इस खेल में यही होता है जो कौवे के साथ हुआ।  याद रखो बनावटी और झूटी जिंदगी में इंसान अंत में न यहाँ का रहता है , न ही  वहाँ का , कौवे कि तरह दोनों तरफ से झूते पड़ते है , और बची कुछ इज्जत से भी हाथ धो बैठता है।  कास कि हर इंसान सिर्फ इतना समझ ले कि वाकई वो सच्ची इज्जत पाना छठा है तो वो केवल अपने वास्तविक रूप में रहे और अपने कर्म करता चला जाए ,कुछ ही दिनों में वो महसूस करने लगेगा की इज्जत क्या होती है। क्योकि हर इंसान कि नजरो में वो वह इज्जत पाने लगता है जिसकी उसको तलास थी।