आँखों के अंधे – Akbar and Birbal story

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एक रानी ने सोचा की अंधे व्यक्तियों को दान देना चाहिए। उन्होंने सरे अंधे व्यक्तियों की खोज शुरू कर दी
परन्तु  राज्य में कुछ ही अंधे  मिल पाये  लेकिन रानी चाहती थी की दो  हज़ार अन्धो को दान दे।  राज्य में अंधे न मिलने पर बीरबल से कहा गया। बीरबल ने पूरा राज्य छान लिया लेकिन इतने अंधे नहीं मिल पाये तो बीरबल ने बादशाह से कहा- जहांपनाह , बहुत से  व्यक्ति ऐसे भी है जो आँखें होते हुए भी देख नहीं सकते क्यों न उनको दान दे दिया जाए।
अकबर – ये क्या कह रहे हो ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी के आँखे है और वो देख नहीं सकता ?
मुझे पहले साबित करके दिखाओ।
बीरबल बोला – ठीक है आप को जल्द ही पता चल जायेगा की मैं सही कहा रहा हूँ।
अगले ही दिन बीरबल ने एक चारपाई ली और गावं के चौराहे पर उसे बुनने लगा , साथ में एक नौकर को भी पेन -कॉपी लेकर बिठा लिया।
एक आदमी बीरबल के पास आया और कहा –  मंत्री जी आप यहाँ क्या कर रहे हो?
बीरबल ने नौकर से कहा – नाम लिख लो इसका।
इतने में अगले व्यक्ति ने  आकर वही सवाल किया कि आप क्या कर रहे हो ?
ऐसे ही दिन भर जो भी आ कर बीरबल को देखता वह यही सवाल करता कि क्या कर रहे हो ?
जो भी ऐसा पूंछता बीरबल अपने नौकर से उसका नाम लिखने को कह देते।
यह खबर बादशाह को पता चली की बीरबल चौराहे पर एक चारपाई  ले कर बैठा है और लोगो के ना लिख रहा है।
ये बात सुनकर बादशाह तुरंत वह पहुंचे।
अकबर -बीरबल, ये तुम क्या कर रहे हो?
बीरबल नौकर से – जहांपनाह का नाम भी जोड़ो लो।
अकबर – यह कैसा उत्तर है ?
बीरबल – जहापना माफ़ी चाहता हूँ पर मैंने आप को कल बताया था न की कुछ लोग अपनी आँखों के होते हुवे भी देख नहीं सकते।  हर कोई मुझसे आकर यही पूंछ रहा है कि मैं क्या कर रहा हूँ।  जबकि साफ साफ दिखाई दे रहा है की दिन की रौशनी में बैठ कर चारपाई बुन रहा हूँ।
दोस्तों जिंदगी में ऐसी कई चीज़े ऐसी होती है जिसे हम देखना नहीं चाहते या तो देख कर अनजान बन जाते है  शायद इसलिए की हूँ उससे लड़ने की हालत में नहीं होते या हम जानते है की हम कुछ नहीं कर पाएंगे तो क्या फायदा कुछ भी कह कर। हद तो तब होती है जब हम अपने हालत और परिस्थितियों को देख कर भी अनदेखा कर देते है लेकिन कभी सोचा है की कब तक हम अंधे होने का नाटक करेंगे ?